
رباعيات حکيم و فیلسوف فرزانه عمر خيام
| اي دوست بيا تا غم فردا نخوريم |
| وين يکدم عمر را غنيمت شمريم |
| فردا کـه ازين دير فـنا درگذريم |
| با هفت هزار سالگان سر بسريم |
| *** |
| برخيز ز خواب تا شرابي بـخوريم |
| زان پيش که از زمانه تابي بخوريم |
| کاين چرخ ستيزه روي ناگه روزي |
| چندان ندهد زمان که آبي بخوريم |
| *** |
| برخيزم و عزم باده ناب کـنـم |
| رنـگ رخ خود به رنگ عناب کنم |
| اين عقل فضول پيشه را مشتي مي |
| بر روي زنم چنانکه در خواب کنم |
| *** |
| بر مفرش خاک خفتگان ميبينـم |
| در زيرزمين نهفـتـگان ميبينـم |
| چندانکـه بـه صحراي عدم مينگرم |
| ناآمدگان و رفـتـگان ميبينـم |
| *** |
| تا چند اسير عقل هر روزه شويم |
| در دهر چه صد ساله چه يکروزه شويم |
| در ده تو بکاسه مي از آن پيش که ما |
| در کارگه کوزهگران کوزه شويم |
| *** |
| چون نيست مقام ما در اين دهر مقيم |
| پس بي مي و معشوق خطائيست عظيم |
| تا کي ز قديم و مـحدث اميدم و بيم |
| چون من رفتم جهان چه محدث چه قديم |
| *** |
| خورشيد بـه گـل نهفت مينتوانـم |
| و اسراز زمانـه گفـت مينـتوانـم |
| از بـحر تـفـکرم برآورد خرد |
| دري کـه ز بيم سفـت مينـتوانـم |
| *** |
| دشمن به غلط گفت من فلسفيم |
| ايزد داند که آنچه او گفـت نيم |
| ليکن چو در اين غم آشيان آمدهام |
| آخر کم از آنکه من بدانم که کيم |
| *** |
| مائيم که اصل شادي و کان غميم |
| سرمايه داديم و نهاد ستـميم |
| پستيم و بلنديم و کماليم و کميم |
| آئينـه زنگ خورده و جام جميم |
| *** |
| من مي نه ز بهر تنگدستي نخورم |
| يا از غم رسوايي و مستي نخورم |
| من مي ز براي خوشدلي ميخوردم |
| اکنون که تو بر دلم نشستي نخورم |
| *** |
| مـن بي مي ناب زيستن نتوانم |
| بي باده کـشيد بارتن نـتوانـم |
| مـن بنده آن دمم که ساقي گويد |
| يک جام دگر بگير و من نـتوانـم |
| *** |
| هر يک چندي يکي برآيد که منم |
| با نعمت و با سيم و زر آيد که منم |
| چون کارک او نـظام گيرد روزي |
| ناگه اجل از کمين برآيد که منم |
| *** |
| يک چند بکودکي باسـتاد شديم |
| يک چند به استادي خود شاد شديم |
| پايان سخن شنو که ما را چه رسيد |
| از خاک در آمديم و بر باد شديم |
| *** |
| يک روز ز بـند عالـم آزاد نيم |
| يک دمزدن از وجود خود شاد نيم |
| شاگردي روزگار کردم بـسيار |
| در کار جـهان هـنوز اسـتاد نيم |
| *** |
| از دي که گذشت هيچ ازو ياد مکن |
| فردا که نيامده ست فرياد مکن |
| برنامده و گذشته بنياد مـکـن |
| حالي خوش باش و عمر بر باد مکن |
| *** |
| اي ديده اگر کور نـئي گور بـبين |
| وين عالم پر فتنه و پر شور بـبين |
| شاهان و سران و سروران زير گلند |
| روهاي چو مه در دهـن مور بين |
| *** |
| برخيز و مخور غـم جـهان گذران |
| بنشين و دمي به شادماني گذران |
| در طبـع جـهان اگر وفايي بودي |
| نوبـت بـتو خود نيامدي از دگران |
| *** |
| چون حاصل آدمي در اين شورستان |
| جز خوردن غصه نيست تا کندن جان |
| خرم دل آنکه زين جهان زود برفت |
| و آسوده کسي که خود نيامد به جهان |
| *** |
| رفـتـم کـه در اين منزل بيداد بدن |
| در دست نخواهد بر خنـگ از باد بدن |
| آن را بايد بـه مرگ مـن شاد بدن |
| کز دسـت اجـل تواند آزاد بدن |
| *** |
| رندي ديدم نشسته بر خنگ زمين |
| نه کفر و نه اسلام و نه دنيا و نه دين |
| نه حق نه حقيقت نه شريعت نه يقين |
| اندر دو جـهان کرا بود زهره اين |
| *** |
| قانع به يک استخوان چو کرکس بودن |
| بـه ز آن که طفيل خوان ناکس بودن |
| با نان جوين خويش حقا که به است |
| کالوده و پالوده هر خـس بودن |
| *** |
| قومي مـتـفـکرند اندر ره دين |
| قومي به گمان فـتاده در راه يقين |
| ميترسـم از آن که بانـگ آيد روزي |
| کاي بيخبران راه نه آنست و نه اين |
| *** |
| گاويست در آسمان و نامش پروين |
| يک گاو دگر نهفـتـه در زير زمين |
| چشم خردت باز کن از روي يقين |
| زير و زبر دو گاو مشـتي خر بين |
| *** |
| گر بر فلکم دست بدي چون يزدان |
| برداشتمي من اين فلک را ز ميان |
| از نو فلکي دگر چنان ساختـمي |
| کازاده بـکام دل رسيدي آسان |
| *** |
| مشنو سخن از زمانه ساز آمدگان |
| مي خواه مروق به طراز آمدگان |
| رفـتـند يکان يکان فراز آمدگان |
| کس مي ندهد نشان ز بازآمدگان |
| *** |
| مي خوردن و گرد نيکوان گرديدن |
| بـه زانکـه بزرق زاهدي ورزيدن |
| گر عاشق و مست دوزخي خواهد بود |
| پس روي بهشت کس نخواهد ديدن |
| *** |
| نـتوان دل شاد را به غـم فرسودن |
| وقت خوش خود بسنگ محنت سودن |
| کس غيب چه داند که چه خواهد بودن |
| مي بايد و معشوق و به کام آسودن |
| *** |
| آن قـصر کـه با چرخ هميزد پهـلو |
| بر درگـه آن شـهان نـهادندي رو |
| ديديم کـه بر کنگرهاش فاختـهاي |
| بنشستـه همي گفت که کوکوکوکو |
| *** |
| از آمدن و رفـتـن ما سودي کو |
| وز تار اميد عـمر ما پودي کو |
| چـندين سروپاي نازنينان جهان |
| ميسوزد و خاک ميشود دودي کو |
| *** |
| از تن چو برفت جان پاک مـن و تو |
| خشـتي دو نهند بر مغاک من و تو |
| و آنـگاه براي خشـت گور دگران |
| در کالـبدي کشند خاک مـن و تو |
| *** |
| ميخور که فلک بهر هلاک من و تو |
| قـصدي دارد بجان پاک من و تو |
| در سبزه نشين و مي روشن ميخور |
| کاين سبزه بسي دمد ز خاک من و تو |
| *** |
| از هر چه بجر مي است کوتاهي به |
| مي هـم ز کف بتان خرگاهي بـه |
| مـسـتي و قلندري و گمراهي به |
| يک جرعـه مي ز ماه تا ماهي بـه |
| *** |
| بنـگر ز صبا دامن گل چاک شده |
| بلـبـل ز جمال گل طربناک شده |
| در سايه گل نشين که بسيار اين گل |
| در خاک فرو ريزد و ما خاک شده |
| *** |
| تا کي غم آن خورم که دارم يا نـه |
| وين عمر به خوشدلي گذارم يا نـه |
| پرکـن قدح باده که معلومم نيست |
| کاين دم کـه فرو برم برآرم يا نـه |
| *** |
| يک جرعه مي کهن ز ملکي نو به |
| وز هرچه نه مي طريق بيرون شو به |
| در دست به از تخت فريدون صد بار |
| خشت سر خم ز ملک کيخسرو به |
| *** |
| آن مايه ز دنيا کـه خوري يا پوشي |
| مـعذوري اگر در طلبش ميکوشي |
| باقي همـه رايگان نيرزد هـشدار |
| تا عـمر گرانبها بدان نـفروشي |
| *** |
| از آمدن بـهار و از رفـتـن دي |
| اوراق وجود ما همي گردد طي |
| مي خورد مخور اندوه که فرمود حکيم |
| غمهاي جهان چو زهر و ترياقش مي |
| *** |
| از کوزهگري کوزه خريدم باري |
| آن کوزه سخن گفـت ز هر اسراري |
| شاهي بودم کـه جام زرينـم بود |
| اکـنون شدهام کوزه هر خـماري |
| *** |
| اي آنکـه نتيجه چهار و هفـتي |
| وز هفت و چهار دايم اندر تفـتي |
| مي خور که هزار بار بيشت گفتم |
| باز آمدنت نيست چو رفتي رفتي |
| *** |
| ايدل تو به اسرار معـما نرسي |
| در نکـتـه زيرکان دانا نرسي |
| اينجا به مي لعل بهشتي مي ساز |
| کانجا که بهشت است رسي يا نرسي |
| *** |
| اي دوست حقيقت شنواز من سخني |
| با باده لـعـل باش و با سيم تـني |
| کانکـس کـه جهان کرد فراغت دارد |
| از سبلت چون تويي و ريش چو مـني |
| *** |
| اي کاش کـه جاي آرميدن بودي |
| يا اين ره دور را رسيدن بودي |
| کاش از پي صد هزار سال از دل خاک |
| چون سـبزه اميد بر دميدن بودي |
| *** |
| بر سنگ زدم دوش سـبوي کاشي |
| سرمست بدم که کردم اين عياشي |
| با مـن بزبان حال مي گفت سـبو |
| من چو تو بدم تو نيز چون من باشي |
| *** |
| بر شاخ اميد اگر بري يافـتـمي |
| هم رشته خويش را سري يافتمي |
| تا چـند ز تنـگـناي زندان وجود |
| اي کاش سوي عدم دري يافتمي |
| *** |
| بر گير پياله و سـبو اي دلـجوي |
| فارغ بنشين بکشتزار و لب جوي |
| بس شخص عزيز را که چرخ بدخوي |
| صد بار پياله کرد و صد بار سـبوي |
| *** |
| پيري ديدم بـه خانـه خـماري |
| گفتـم نکـني ز رفتگان اخباري |
| گفتا مي خور که همچو ما بسياري |
| رفـتـند و خـبر باز نيامد باري |
| *** |
| تا چند حديث پنج و چار اي ساقي |
| مشکل چه يکي چه صد هزار اي ساقي |
| خاکيم همه چنگ بساز اي ساقي |
| باديم همـه باده بيار اي ساقي |
| *** |
| چـندان کـه نگاه ميکنم هر سويي |
| در باغ روانـسـت ز کوثر جويي |
| صـحرا چو بهشت است ز کوثر گم گوي |
| بنـشين بـه بهشت با بهشتي رويي |
| *** |
| خوش باش که پختهاند سوداي تو دي |
| فارغ شدهاند از تـمـناي تو دي |
| قصـه چه کنم که به تقاضاي تو دي |
| دادند قرار کار فرداي تو دي |
| *** |
| در کارگـه کوزهگري کردم راي |
| در پايه چرخ ديدم اسـتاد بـپاي |
| ميکرد دلير کوزه را دسـتـه و سر |
| از کلـه پادشاه و از دسـت گداي |
| *** |
| در گوش دلم گفت فلک پنهاني |
| حکمي که قضا بود ز من ميداني |
| در گردش خويش اگر مرا دست بدي |
| خود را برهاندمي ز سرگرداني |
| *** |
| زان کوزه مي که نيست در وي ضرري |
| پر کن قدحي بخور بمـن ده دگري |
| زان پيشتر اي صنم که در رهگذري |
| خاک من و تو کوزهکـند کوزهگري |
| *** |
| گر آمدنـم بـخود بدي نامدمي |
| ور نيز شدن بمـن بدي کي شدمي |
| بـه زان نبدي که اندر اين دير خراب |
| نـه آمدمي نه شدمي نـه بدمي |
| *** |
| گر دست دهد ز مغز گـندم ناني |
| وز مي دو مني ز گوسفندي راني |
| با لاله رخي و گوشه بسـتاني |
| عيشي بود آن نه حد هر سلطاني |
| *** |
| گر کار فلک به عدل سنجيده بدي |
| احوال فلک جمله پسـنديده بدي |
| ور عدل بدي بـکارها در گردون |
| کي خاطر اهل فضل رنجيده بدي |
| *** |
| هان کوزهگرا بپاي اگر هشياري |
| تا چند کني بر گل مردم خواري |
| انگشـت فريدون و کف کيخسرو |
| بر چرخ نهاده اي چه ميپنداري |
| *** |
| هنگام صبوح اي صنم فرخ پي |
| برساز ترانـهاي و پيشآور مي |
| کافکند بخاک صد هزاران جم و کي |
| اين آمدن تيرمه و رفـتـن دي |
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